Sunday, 9 June 2013

न्याय

आज तक सोचती रही हूँ सिर्फ अपने लिए
उस औरत के लिए ,
जो पिटती रहती है मेरे पड़ोस में
और मैं मुट्ठियाँ भींचे चुप रहती हूँ
किसी के निजता की रक्षा के लिए
जबकि मैं ये अच्छी तरह जानती हूँ की उसकी पीठ के नीले निशान पड़ते है पूरी औरत जात पर

मैं तब भी चुप रहती हूँ आँखों मैं आंसू लिए
जब वो जला दी जाती है
एसिड से या फिर दहेज़ की आग में
मैं पट्टी बाँध लेती हूँ आँखों पर गांधारी के तरह, जब हम सडको पर घुमाई जाती हैं निर्वस्त्र
मैं तब भी चुप रहती हूँ
जब !
जब !
जब !
मगर क्या आज भी चुप रहूँ जब
उसे तो औरत
बनने से पहले ही मिल गयी पूरी औरत जात की सजा

जब तुम सर झुका कर कहते हो
मैं शर्मिंदा हूँ
तब मैं तुम्हारे लिए कुछ करना चाहती हूँ !

आज तक मेरे लिए तो किया नहीं कुछ
अब खुद के लिए तो करो
या फिर दे दो न्याय दंड मेरे हाथों में
मृदुला शुक्ला

1 comment:

  1. कोई भगवान् ना आया जान कर इंसान ने खुद क़ानून और सिस्टम बनाया ...
    फिर पुरुषों को ना आता देखकर स्त्रीयों ने खुद पहल की है ...

    प्रकृति निर्मम है , कहीं न कहीं खुद ही आगे बढ़कर ये जिम्मा लेना होता है ...
    अन्यथा अच्छाई को कमजोरी मान लिया जाता है मूर्खों द्वारा ...

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