Monday, 21 January 2013

तस्वीर का रुख बदल जाएगा

तीज पूजी
अहोई आठे
चौथ पूजी
छठ पूजी
मजबूत कलाईओं  को पकड़
रक्षा का सूत्र बाँधा
तिलक किया
लम्बी उम्र की कामना में
कभी बरगद
तो कभी पीपल
के फेरे लिए
मांग मांगी
कोख मांगी
पुत्र और भरतार माँगा
ताप माँगा
ओज माँगा
युद्ध में
रण में
विजय में
तेज माँगा
खुद जली
ब्रह्माण्ड सारा
रख कर डाला
सोचते हैं
हम कहा पर थे सही
और हमारी
कहाँ पर हैं
गलतियां
अब हमें ये
जीर्ण शीर्ण
विदीर्ण
तस्वीर बदलनी होगी
थाम कर
नाज़ुक कलाई को
बाँध दो अब
सूत्र रक्षा के नए
गढ़ेंगे हम
व्रत नए
अनुष्ठान नए
हंसी माँगे
ख़ुशी माँगे
भाव माँगें
दया माँगें
प्रेम माँगें
सरलता की
तरलता की
धैर्य की प्रतिमूर्ति-
बेटियां माँगें दुआ में
देखना फिर एक दिन
तस्वीर का रुख बदल जाएगा

Sunday, 6 January 2013

बस तुम हमारा साथ दो

मैं तुम्हारी ज़िन्दगी से आंसुओं के पल चुराकर,
मुस्कुराते हास के कुछ फूल भर दूंगी,
बस तुम हमारे साथ दो...........

मायूसी के, दुखों के, अवसाद के
लाख छाये मेघ/
खाद पानी भले ही मिलता रहे
विषमताओं का/
निराशाओं के चले हल/
पड़ चुके हो बीज चाहे हार के/
देखना तुम मैं उसी में
सहज ही,
मुस्कान बो दूंगी
बस तुम हमारा साथ दो.....

साथ में चाहे ज़माना हो न हो,
हौसलों से बढ़ा करते काफिले
होठ पर मुस्कान चाहे हो न हो,
आंसुओं से बढ़ा करते हौसले
राह मैं कांटे बिछे या फूल हों,
दृष्टि मे रहती सदा ही मंजिलें,
बन्धनों को /
रूढ़ियों को/
जीर्ण शीर्ण परम्परों को/
दिखा कर ठेंगा
देखना तुम,
एक दिन
मैं ख़ुशी के साथ हो लूँगी,
बस तुम हमारा साथ दो

-मृदुला शुक्ला

मुझे लिखना है............


सुनो,
कोई मुझे लिखना सिखा दो,
मैं लिखना चाहती हूँ ,
मुझे लिखना है--

उस रात के बारे में,
कितना अँधेरा था,
जब सधः प्रसव पीड़ा मुक्त,
मेरी माँ को,
दाई ने कहा होगा,
"एक और प्रसव पीड़ा बाकी है अभी तुम्हारे हिस्से मे"

मैं लिखना चाहती हूँ,
अपना बचपन,
गुड्डे गुड़ियों/ अभावों में शहंशाही

अपनी अनपढ़ माँ और उसके सपनो की मोटी किताबों के बारे में,
अपने पिता और हर रिश्ते पर भारी पड़ती उनकी महत्वाकांक्षा के बारे में,

मुझ धर्म पर नहीं लिखना|
अध्यात्म पर भी नहीं|
भूख और गरीबी पर तो बिलकुल नहीं|
राजनीती/ कूटनीति समझ ही नहीं आती मुझे|

मुझे तो बस लिखना है खुद के बारे में,
श्वेत अश्व/ राजकुमार ,
कसौटियों/ टूटते विश्वास,
के साथ परिपक्व होते छल के बारे में,
कोई मुझे लिखना सिखा दो|
मुझे लिखना है............

-मृदुला शुक्ला

पत्थर

"तुम"
और
तुम्हारे पीछे
चुप चाप चलती
"भीड़"
पास ही कहीं ?
नेपथ्य/श्मशान/सन्नाटा

अचानक
भीड़ के हाथों में
"पत्थर"
पास ही कहीं ?
मसीह/गैलीलियो/सुकरात

पत्थरों की कारस्तानी
आज जाना !!
समझ आया !!
तुम्हारा पूजा जाना
तुम जड़ होकर
"चेतना"
को विस्तार देते हो
मंदिरों में पथराये
से बैठे रहते हो
और भीड़ के
हाथ में आकर
आदमी को तार देते हो

आग

ज्वाला मुखी की
'आग'
कब बनना चाहा मैंने?
विध्वंस ही तो प्रतिबिंबित होता है|

यज्ञ की लपटे,
गिरती हुई समिधा के साथ ही,
तो ऊपर उठती हैं |
कभी पवित्र क्यों नहीं लगती मुझे ?
आसपास बैठे यज्ञोपवीतधारी पुरोहित,
अपनी आवाज़ ऊंची कर ,
एक दुसरे की आवाज़े दबाते हुए से लगते हैं मुझे|

और सूरज क्या बनना?
जिसे उगते समय ही तो अर्घ मिलता है,
वो भी भयवश|

और सप्तपदी की आग
वो भी कब बनना चाहती हूँ मैं?
किसने निभाई?
आजतक,
इसके इर्द गिर्द ली गयी कसमे|

मैं तो बनना चाहती हूँ-
राख के नीचे दहकता हुआ गोबर का उपला,
जिसे शाम के धुंधलके में,
कलछुल में माँगा जाता रहा है
हज़ारों हज़ार बरस,
जिसने भूख मिटाई है
सदियों तक
सभ्यता की|
चुप चाप !!!

-मृदुला शुक्ला

खाप

 


एक थी खाप
एक दिन

हुकुम हुआ
बेटियां ब्याह दी जाएँ
सोलह वर्ष से पूर्व

जनक ने सुना
स्वयंवर रचा
हजारों में
महापराक्रमी राम को चुना
और सोलह वर्ष से पूर्व
ब्याह दी गयी सीता
"फिर भी"
हरण/अग्निपरीक्षा/वन गमन
(अंत में भूमिगत ही होना पड़ा)

एक थे द्रुपद
उन्होंने ने सुना
स्वयंवर रचा
और सौंपी अपनी पुत्री
पांच महापराक्रमी पुरुषों की सुरक्षा में
फिर भी
चीरहरण?..............(क्या पहना था द्रौपदी ने उस समय कहीं मिनी स्कर्ट तो नहीं?)

एक थी अहिल्या............
..................................
..................................

अरे त्रेता के धोबियों
कलयुग में फिर से आ गए
नेता बनकर??
-मृदुला शुक्ला

Thursday, 3 January 2013

तुम भला क्या जान पाओगे ?


तवे पे सिकती हुई रोटियों की महक
भूख को कैसे बढाते हैं ?
कर्कटों में घुमते पीठ पर थैला लिए,
एक टुकड़ा प्लास्टिक का
बेकलों की आँख में,
उम्मीद के, कौन से सपने जागते हैं

तुम भला क्या जान पाओगे?

बादलों को देखकर झूमते हैं मोर
और गीत गाते हैं पपीहे,
और तुम भी तो,
मेघ और मल्हार के उत्सव मनाते हो !
चरमराती झुग्गियों
और फरफराती पन्नियों को देखकर
वे बेचारे रात भर,
किस तरह से सिहर जाते हैं ?

तुम भला क्या जान पाओगे ?!

करो तुम बाते बड़ी
अहले वतन की,
मान की
अभिमान की
अगरु चन्दन मान लो
धूल तुम अपने धरा की
बिन दवा बिन दूध के,
गोद में मरते हुए,
मौत से लड़ते हुए,
आंसुओं को रोकते,
पुतलियों का पत्थरों में बदल जाना

तुम भला क्या जान पाओगे?
-मृदुला शुक्ला

Wednesday, 2 January 2013

 सन्नाटे  बोकर  गीत  उगाती  हूँ!!

 सन्नाटे बोकर गीत उगाती हूँ
देखो मै तूफानों में भी दीप जलाती हूँ ,

बिजुरी को बाँधा है मैंने आँचल से
मैं मेह खींच कर लाती हूँ काले जिद्दी बादल से,

सूरज भी मेरी खातिर छुप छुप कर छांह करे है
अग्निमुखी गीतों से मै अलख जगाती हूँ,

सन्नाटे बोकर गीत उगाती हूँ!

बंजर मे भी बीजों के बिन आशा के पौध लगाती हूँ
शमशानों मे भी जाकर जीवन ही दोहराती हूँ,

घिर कर के घोर विप्पति मे भी अपना धर्म निभाती हूँ
मैं नीलकंठ विषपायी बनकर जहर पचाती हूँ,

सन्नाटे बोकर गीत उगाती हूँ !

-मृदुला शुक्ला