Sunday, 9 June 2013

इच्छाएं

इच्छाओं की मृत्यु पर होता ही मिथ्या रुदन
उनके दत्तक पुत्र नहीं आते आगे
अंतिंम संस्कार को
हरे कल्लेदार बांस नहीं कटते
बंधती नहीं तिखितियां
निर्वाह नहीं होता मुखाग्नि की परम्परा का
तिरोहित नहीं किया जाता तर्पयामि की ध्वनी से
कुशाग्र पर रख काले तिल
शोक समाप्ति के दिन नहीं घुटवाते
इच्छाओं की तरह उग आये बाल

नहीं सुना जाता गरुड़ पुराण आत्मा की मुक्ति हेतु

इच्छाएं न तो मुक्त होती हैं स्वम्, और न करती है हमें
हमारे कंधे ढोते रहते हैं
उनकी बजबजाती लाश आस पास मंडराता रहता है उनका प्रेत
                                                                                                       -मृदुला शुक्ला

देवता

मैं देखती हूँ स्वप्न
एक दिन धरती पर जब पाप होगा अपने चरम पर
(चरम की परिभाषा निर्धारित नहीं है )
सभी पत्थरों से देवता कर जायंगे कूच
और निकल आयेंगे बाहर
चूँकि देवता इंसानों के डर से अपने मंदिर
मैं नहीं रहते निहथ्थे
इसलिए जब वे आयेंगे बाहर
तो होंगे हथियारों से लैस

वे टिक न पायंगे मिसाइलों के सामने
भाले धनुष और तलवार लेकर
हार जायंगे हर लड़ाई
इंसान अपने गढ़े देवताओं को देखेगा हारते
कोसेगा अपने पूर्वजों को
फिर गढ़ेगा
नया इश्वर
नए देवता
उनके हाथों में होंगे आधुनिक हथियार
काश की इस बार वो अपने देवता गढ़े
हाड़ मांस के
न कि पत्थरों से
                                                    मृदुला शुक्ला

न्याय

आज तक सोचती रही हूँ सिर्फ अपने लिए
उस औरत के लिए ,
जो पिटती रहती है मेरे पड़ोस में
और मैं मुट्ठियाँ भींचे चुप रहती हूँ
किसी के निजता की रक्षा के लिए
जबकि मैं ये अच्छी तरह जानती हूँ की उसकी पीठ के नीले निशान पड़ते है पूरी औरत जात पर

मैं तब भी चुप रहती हूँ आँखों मैं आंसू लिए
जब वो जला दी जाती है
एसिड से या फिर दहेज़ की आग में
मैं पट्टी बाँध लेती हूँ आँखों पर गांधारी के तरह, जब हम सडको पर घुमाई जाती हैं निर्वस्त्र
मैं तब भी चुप रहती हूँ
जब !
जब !
जब !
मगर क्या आज भी चुप रहूँ जब
उसे तो औरत
बनने से पहले ही मिल गयी पूरी औरत जात की सजा

जब तुम सर झुका कर कहते हो
मैं शर्मिंदा हूँ
तब मैं तुम्हारे लिए कुछ करना चाहती हूँ !

आज तक मेरे लिए तो किया नहीं कुछ
अब खुद के लिए तो करो
या फिर दे दो न्याय दंड मेरे हाथों में
मृदुला शुक्ला

चाँद

बचपन में जब जिद पर अड़े
छूने को चाँद
माँ ने उतार दिया
पूरनमासी का चाँद थाली भर पानी में

चाँद भी न, आता है
चप्पू चलाता खुबसुरत रंगों की पाल डाले
पानियों के रास्त जमीन पर उतरने की
आदत सी है उसे

चाँद को याद रहता है धरती और आकाश के बीच
फैले निर्वात के बारे में
और विज्ञान की कक्षा में पढ़ा ये नियम
निर्वात मैं चलने के लिए
ध्वनि को भी आवश्यकता होती है माध्यम की

जब भूले से कभी प्रेयसिया
मांग कर बैठती हैं चादं की
अपने प्रेयस से किसी कमज़ोर पल मे
वो भी दे जातें हैं ढेर सारा पानी
उनकी आँखों में

आखिर चाँद को पानी के सहारे ही तो उतरना होता ज़मीन पर
                                                                                              -मृदुला शुक्ला

ख़ास आदमी

अगर तुम हो आम आदमी
इस बार प्रार्थना में
ईश्वर से माँगना
गूंगी बहरी और अंधी हो जाए तुम्हारी आत्मा
ताकि तुम भी बन सको ख़ास

अगर आत्मा की होती है आवाज
तो उसे सुनने के लिए जरुर होते होंगे आत्मा के कान
फिर तो आँखे भी होती होंगी कहीं न कहीं

मगर खास लोग तो शायद
मांगते नहीं छीन लेते हैं

फिर बंद करो दैन्य प्रार्थनाएं
सारे आम लोंगो
मिलकर धावा बोल दो
ईश्वर को कर दो मजबूर
कहो की वो वापस ले
हमारी आत्मा के आँख कान और जुबान

देखो न !!

कितना आसान है आम से ख़ास हो जाना
                                                                              -मृदुला शुक्ला

बंद कमरा

बहुत बेतरतीब है कामगारों की बस्ती सा ये कमरा ,
बंद पड़ी दीवाल घडी वक्त पूछती रहती है सबसे
वक्त बे वक्त
और हमेशा अपना सीना टटोल मिस करती रहती है
टिक टिक की आवाज

चिंता में रहती है तीन टांगो वाली डायनिंग टेबल
इस घर के लोग अब कुछ खाते क्यूँ नहीं
याद करती है पकवानों की खुशबु
और खो जाती है बिना रुके चलती पार्टियों के दौर में

गठ्ठर मैं बंधी किताबें हुलस कर बात करती हैं अक्सर
उन दिनों की जब वो चिपकी रहा करती थी किसी नाजनीन के सीने से

इस कमरे में अक्सर कानाफूसी होती है
यंहा टेबल तीन पैर की तिपाया दो पैर का
कुर्सियां बिना हत्थे की क्यूँ हैं

जब भी चरमरा कर खुलता है दरवाजा
चौकन्नी हो जाती है जंग खाई सिलाई मशीन
शायद आज फिर कोई तेल डाल करेगा पुर्जे साफ़, ,
वो इतराती हुई सी गढ़ेगी कुछ नया सा

हैंडल टूटे मग अक्सर बाते करते हैं कॉफ़ी के
अलग अलग फ्लेवर के बारे में,

कभी कभी मुझे ये कमरा बस्ती से दूर किसी वृधाश्रम सा लगता है
जहाँ सब खोये होते हैं अपनी जवानी के दिनों में,
सब रहते हैं उदास,
धूल की एक मोटी चादर बड़े प्यार से
समेट कर रखती उन सबको अपने भीतर,
जैसे अवसाद समेटे रहता है बुजर्गों को

मकड़िया मुस्कुराती रहती हैं सुन कर इनकी बातें
बुनते हुए जाल इस छोर से उस छोर तक
मानो सेवक हो वृधाश्रम के

                                                              -मृदुला शुक्ला

उम्मीदें-सपने...

एक जहाँ हो हमारा भी
जहाँ तल्खियां मुस्कुरा कर गले मिले
रुसवाइयों को मिल जाए पंख शोहरतों के
जब तोली जाए खुशियाँ बेहिसाब
तो दूसरे पलड़े पर रखा जाए थोड़ा सा गम

सुबहें थोड़ी धुंधली सही
शामे पुर रौशन हों
बूढी इमारतों के पास हो अपनी खुद की आवाज
जो भटके मुसाफिरों को रास्ते पर लायें
सुना कर कहानी अपनी बुलंदगी के दिनों की

जहाँ हमारी हाँ को हाँ
और ना को ना सुना जाए
वही समझा भी जाए

शायद मैं नींद में हूँ

मगर क्या करूँ मेरी उम्मीदों के पाँव भारी हैं
मेरे सपने पेट से हैं
                                                                                         -मृदुला शुक्ला

Friday, 24 May 2013

तीली...


त्रासद है
बनना दिया
मगर सार्थक हो जाता है जलना
जब तेज हवाओं में हिलती लौ
सहेज ली जाती है
दो मेहंदी लगी हथेलियों से

बनना दिया पूजा की थाल का
हर हाथ गुजर जाता है
उसके ऊपर याचक की मुद्रा में
निगाहें नीची किये
मांगते हुए कभी क्षमा कभी कुछ और

तुलसी के चौरे का ,
माथे पर आँचल किये
पनीली आँखे समेटती हैं उजास
अपनों के लिए
और हर जगह पास पड़ी
तीली सुलग रही होती है
धुंवा धुंवा
सौंप कर दिए को
अपना प्रकाशवाही साम्राज्य
मृदुला शुक्ला

मकान

सिमटती ज़मीन ने गढ़े घरों के नए नाम
घर सिमटे फ्लैट में
और जिंदगियां बेडरूम हो गयी

जो कभी हुआ करते थे
राजे महराजों के
अलग अलग मौसम और
रानियों के मिजाज़ के हिसाब से

घुरुहू मंगरू तो सो रहते थे
ओसारे में चारपाई डाल
थकान से पस्त
औरत मर्द अगल बगल
नीम अन्धेरा सन्नाटा तोडती
झींगुरो और सियारों
की स्वर लहरिया
एक दुसरे के साथ संगत करती सी

रौशनी से जगमगाते शहर में
नींद की गोलियां खा
अभिनयरत हैं सभी नींद के
चिंहुक चिहुंक

मानो महाराजा हैं किसी मुल्क के
हमला हो सकता है किसी भी वक्त
मृदुला शुक्ला

प्यास का इतिहास...



प्यास का इतिहास लिखे जाने की
मुनादी हुई नक्कार खानों से
(जहाँ कभी नहीं सुनी गयी आवाज तूती की )

बुलाये गए समंदर सारे
झीलें भी न्योती गयीं
नदियां भी आई ,पूरी सजधज से
कुओं ने भी जुगत लगाईं
और शामिल हो गए
सदस्य् मंडल में

तैयार हुआ इतिहास
चटपटी मसालेदार कहानी सा .............

काश! उनमे शामिल होता
आधा भरा घड़ा, या फिर
पूरी भरी सुराही
शायद इतिहास मसालेदार कहानी नहीं
सचमुच होता, प्यास का का इतिहास
                                                                  -मृदुला शुक्ला

Sunday, 12 May 2013

एक वचन...



जब तुम मुझसे कर रहे थे प्रणय निवेदन
तुम्हारी गर्म हथेलियों की बीच
कंपकंपा रहा था मेरा दायाँ हाथ
ठीक उसी वक्त
तुम्हारे कमरे की दीवार पर मेरे ठीक सामने
टगी थी एक तस्वीर
जिसमे एक जवान औरत पीस रही थी चक्की
और बूढी औरत दे रही थी चक्की के बीच दाने
पास ही औंधा पड़ा खाली मटका
उन्हें उनकी अगली लड़ाई की याद दिला रहा
उसी तस्वीर में एक जवान आदमी दीवार से सिर टिका
गुडगुडा रहा था हुक्का
और एक बुड्ढा वहीँ बैठा बजा रहा था सारंगी

मुझे स्वीकार है तुम्हारा प्रणय निवेदन
बिना सात फेरों के बिना सातों तो वचन के !!
बस एक वचन की
जब मेरा बेटा कर रहा हो प्रणय निवेदन अपनी सहचरी से
तो उसके पीछे दीवार पर टंगी तस्वीर में
बूढी औरत बजा रही हो सारंगी
बुढ़ा गुडगुडा रहा हो हुक्का
और जवान औरत और आदमी
मिल कर चला रहे हो चक्की
सुनो !क्या तुम मेरे लिए
बदल सकते हो दीवार पर टंगी इस तस्वीर के पात्रो  की जगह भर ?




Monday, 22 April 2013

अजनबियत...

कल अजनबी सा ये शहर
आज खासा हमदर्द सा लगा
जब से जाना
अजनबियत है
कायदा और अदब इसका

आज गुजरते हुए फुटपाथ से
देखा चार पैबंद लगी चादरों
को खींच कर बनाया प्रसव् गृह
और भीतर जन्म लेता
एक नया जीव

सामने पार्क के ब्याई काली कुतिया
याद आ गयी
सदः प्रसवा शिशु पिल्लै गडमगड
हो गए मेरी आँखों के सामने

मैंने चढ़ाया आँखों पर
अजनबियत का चश्मा
आखिर ये कायदा और अदब है मेरे
मेरे शहर का
और देखो !
अब ये शहर अजनबी नहीं रहा
मृदुला शुक्ला

उदासी

बहुत ख़याल रखती है ये उदासी मेरा
दिन भर आस पास रहती है
जिसे छोड़ गए थे
मेरे दायरों में तुम ,
और शायद बोल भी गए होगे
ख़याल रखने को

दिन भर ओढ़ कर रखती हूँ इसे
शाम को आधा बिछा लेती हूँ
और जो बचती है
इसे आँखों से गिरा
चादरों और तकियों
पे सजा लेती हूँ

ये सितारों जो सजे होते हैं तकियों पे मेरे
रात भर जुगनू सा टिमटिमाते हैं

डरती हूँ कहीं लौट करआ जाओ न तुम
मेरी शामों मेरे तकियों
पे सजे तारे समेट लेने को
लगा के मुझे फिर से
गुलाबी रौशनी का नशा
चुपचाप बिन कहे
फिर से चले जाने को
मृदुला शुक्ला

मेरी कविता...

मैंने कब कहा की मैंने जो लिखा
उसे सजा दो तुम मंदिरों मैं
मान कर तुलसी का मानस
ये भी तो नहीं कहा की
मानो मुझे अपाला घोषा या गार्गी

इमान से सोच कर बोलो की मैंने कहा कभी ये
की मैं गढ़ रही हूँ कोई शास्त्र या पुराण
भयभीत मत हो
भय और असुरक्षा आक्रामक बना देती है हमें
बेवजह

माना की तुम स्वम्भू पञ्च हो
अनादि परमेश्वर
हमें साध नहीं है
पञ्च होने की
कूको न तुम पंचम स्वर में
हमें गाने दो हमारा आदिम अनगढ़ गान

( झींगुरों और टिटिहरियों के आवाज के बिना भी अपूर्ण होता है जंगल )
मृदुला शुक्ला

खुद से प्रेम...

जब बात चलती है प्रेम की तो आँखों में
तैर जाता है तुम्हारा चेहरा अनायास
फिर हिंडोले सा झूलता है हुआ
तुम्हार संसार
सहेजती हूँ!!
पिछली शाम
खरीद कर लाया टी सेट ,
माँकी दी हुई साडी ,
सासु माँ के कंगन,
वो तुलसी जो बालकनी को आँगन बनती है

संभाल कर जलाती हूँ रोज मंदिर का दिया
अंदर कुछ टूट जाता है जब
बर्तन मांजते हुए महरी से टूट जाता है
पुराने कप का हैण्डल

बेचैन रहती हूँ दिन भर
जब तुम भूल जाते हो अपना टिफिन
हड़बड़ी में
जबकि जानती हूँ की कंटीन है
तुम्हारे केबिन के बगल में

जीती हूँ तुम्हारे रिश्ते नाते
अपनों की तरह
तुम्हारी दुनिया की परिधि में खींच लेती हूँ एक नयी वृत्त
तुम्हे केंद्र मान कर
सब से प्रेम करती हूँ
सिवाय खुद के
कल एक ख्याल आया की
चलो खुद से भी प्रेम किया जाए

धत्त !!औरतों से भी कोई कोई प्रेम करता है
उनसे तो इश्क किया जाता है
मृदुला शुक्ला

चाँद और रोटी

पिछली पूरनमासी पर जब तुम्हारा पोर पोर
डूबा हुआ था चाँद से टपकते शहद मैं
तो मैं अपनी कविता में बो रही थी रोटियाँ
खेतों मैं गेंहू बोने सा
बालियों में रस पड़ने सा
या खेतों में पक कर सुनहरी धूप के फैलने सा

क्यूंकि चादं से टपकता शहद एक चीख बन कर मेरे
कानो में घुला था
भूखों !यूँ मत देखो मुझे मैं रोटी नहीं हूँ

जबकि मैं जानती हूँ की कवितायें नहीं भरती पेट
कविता लिखने वालों का भी

जब तुम गा रहे थे झील बादल ओस !
तो मैं भटक रही होती हूँ तीजन के साथ
सर पर पानी का मटका लिए
पत्थरों के जंगल मैं
तुम्हारे ख्यालों की झील से से १० कोस दूर

क्यूंकि मैं ये भी जानती हूँ की ओस चाटने से प्यास नहीं बुझती

तुम चलो ना !
रास्ते के दायीं तरफ और
मैं चलती हूँ बायीं तरफ
फिर भी हम होंगे साथ साथ
सामानांतर और
शायद अलग अलग भी 
                                                       -मृदुला शुक्ला 

खबर

सुबह तो लपक कर पकड़ते हो तुम हमें
और फिर सबसे पहले मिलती
भी उसे हूँ जो
पावरफुल हो घर में
रिटायर्ड बुजूर्ग ताकते हैं अपनी बारी को
इस उलाहने के साथ
की कौन सा तुम्हे ऑफिस जाना है

कई बार मुझे होठों मैं बुदबुदा कर पढ़ा जाता है
तो कई बार चटखारे लेकर जोर जोरसे
पड़ोसियों को भी कभी कभी सुनना पड़ता है अनचाहे
मुझे अगर मुझे में ताने जैसा मसाला हुआ तो

जितनी मसालेदार हुई
पढ़ी भी जाती हूँ उतने उच्च स्वर मैं

अरे अखबार की
खबर हूँ मैं !
मगर शाम होते ही हो जाती हूँ बासी
फिर एक दिन बेच दी जाती हूँ
कबाड़ी के हाथ कबाड़ के भाव
और रीसाइक्लिंग मैं बिखर जाता है रेशा रेशा मेरा

और आज फिर देखो मैं आ गयी पुनर्जन्म लेकर
अरे हम ख़बरें भी मरती हैं क्या भला
हम तो बस बदल लेती हैं अखबार
मृदुला शुक्ला

कविता...

मैं नहीं लिखना चाहती कविता
न गढ़ना चाहती हूँ
ये न तो रास है न रंग
न ही मेरा प्रेमपत्र
ये बाकायदा प्रसवित की जाती मेरे द्वारा
एक सम्पूर्ण प्रसव वेदना के उपरांत

विसंगतियां बीज डाल देती हैं मुझमे
मेरी संवेदना की नाल से जुड़ वो
सोखने लगती ही प्राण रस
अवधि पूरी होने पर अवशम्भावी है
प्रसव का हो जाना

"मेरी संवेदना और विसंगतियों की वैध संतान है मेरी कविता "
                                                                                                                          -मृदुला शुक्ला

Thursday, 4 April 2013

सन्नाटे बोकर गीत उगती हूँ...

सन्नाटे बोकर गीत उगाती हूँ
देखो मै तूफानों में भी दीप जलाती हूँ ,

बिजुरी को बाँधा है मैंने आँचल से
मैं मेह खींच कर लाती हूँ काले जिद्दी बादल से,

सूरज भी मेरी खातिर छुप छुप कर छांह करे है
अग्निमुखी गीतों से मै अलख जगाती हूँ,

सन्नाटे बोकर गीत उगाती हूँ!

बंजर मे भी बीजों के बिन आशा के पौध लगाती हूँ
शमशानों मे भी जाकर जीवन ही दोहराती हूँ,

घिर कर के घोर विप्पति मे भी अपना धर्म निभाती हूँ
मैं नीलकंठ विषपायी बनकर जहर पचाती हूँ|
सन्नाटे बोकर गीत उगाती हूँ !

                                                                                                    -मृदुला शुक्ला

महिला दिवस

 आइये मनाएं महिला दिवस
की शायद कल हट सकें
अस्पतालों के बाहर लगी तख्तियां
जिन पर लिखा होता है
की "यहाँ लिंग परिक्षण नहीं किया जाता"
(की जो इशारा मात्र होता है
 यह बताने का यहाँ ये संभव है)

की शायद बंद हो सके
दी जाने वाली बधाईयां
पुत्र जन्म पर
गाये जाने वाले सोहर
बजाई जाने वाली थाली
हिजड़ों के नाच
और बेटी के जन्म पर
"कोई नहीं जी आजकल तो
बेटे और बेटी बराबर हैं"


की शायद फिर न
नोच कर फेक दी जाए
गटर के पास कोई कन्या
जो पिछले नवरात्रों में
पूजी गयी थी
देवी के नाम पर

की शायद बंद हो सके चकले
जहाँ हर दिन औरत
तौलकर खरीदी जाती है
बकरे और मुर्गे
के गोश्त के भाव

की शायद जीवन साथी चुनते समय
देखि जाए सिर्फ और सिर्फ लड़की
न तौली जाए रूपए या रसूख के पलड़े पर
और फिर न ढ पड़े किसी बाप को अपनी
जिन्दा जलादी गयी बेटी की लाश

की शायद खाली पेट
और दोहरी हुई पीठ
पर बच्चा बांधे
सर पर सीमेंट का टोकरा लिए
बिल्डिंग की इमारत पर चढ़ती औरत
न तौली  जाए
ठेकेदार की नज़रों से
रात के
स्वाद परिवर्तन के लिए

की शायद फिर न
कोई प्यारी खूबसूरत शक्ल
जला दी जाए एसिड से
अस्वीकार करने पर
अवांछित प्रणय निवेदन

की हम औरते भी मानी जाए
देह से परे भी कुछ
बलत्कृत न हों
हर बार
घर से बाहर निकलने पर
भीतर तक भेदती निगाहों से
और उन गालियों से
जो हमारे पुरुषों को दी जाती हैं
हमारे नाम पर

की शायद.........
की शायद......

की हम भी
स्वीकार कर लिए जाएं
सामान्य इंसान की तरह
आइये मनाये महिका दिवस
इस उम्मीद के साथ
की अगले वर्ष कुछ तो
बदला रहेगा हमारे लिए

                                                                        -मृदुला शुक्ला

फाग..


सुबह से होली की धूम रही
हम एक दुसरे के गालों पर लगा कर
काले, हरे ,सियाह रंग
एक दुसरे के चेहरों को कर बदरंग
नाचते रहे ढोलकी की थाप पर
ढोलकी भी गाता रहा
"चिपका ले सैयां फेविकोल से "
और बेचारा फाग
दूर उदास खड़ा हमें देखता रहा
मैंने बात की तो कहने लगा .......................

अफ़सोस करूँ ये की मुझे भूल गए सब
या यूँ कहूं की लोग मुझे जानते नहीं

फाग .....(फागुन मैं होली पर गाया जाने एक विशेष गीत )
                                                                                                -मृदुला शुक्ला

ईसा मसीह नहीं हूँ....



तुम्हे पता भी है ?
की तुम्हारे सवालों ने मुझे
हर बार लटकाया है सलीब पर !
जबकि तुम भली भाँती जानते थे
की मैं ईसा मसीह नहीं हूँ


फिर मैं हर बार
बुदबुदाती रही
हे प्रभू !
इन्हें माफ़ करना
क्यूंकि ये नहीं जानते की ये मेरे लिए क्या हैं ?
                                                                                -

                                                                                                  -मृदुला शुक्ला

यादें

यादें बचपन के अंगूठे में लगी
ठेस सी होती हैं
जो भरते भरते
फिर से ही दुःख जाती हैं अचानक
खेल खेल में

और भूलने की कोशिश
उन की सलाइयों पर
छूट गया वो फन्दा
जो शाम को उधड़वा देता है
पूरी बुनाई
कल दुबारा बुनने के लिए

जेठ की दोपहर मैं डामर वाली सड़क पर
खुले सर और नंगे पाँव चलना है
जब पिघलता डामर लिपट रहा हो पैरों से
तो बस हिकारत से देख सूरज को कह देना
देखो तुम भी मत टपक पड़ना
इन निगोड़ी यादों सा

भूलना और याद करना शायद
पहुंचना होता है टी पॉइंट पर
जहाँ ख़तम नहीं होता पुराना रास्ता
बस दो और राहें फूट पड़ती है
उलझन भरी
                                                                          मृदुला शुक्ला

बड़े शहर

बहुत ख़याल रखती है ये उदासी मेरा
दिन भर आस पास रहती है
जिसे छोड़ गए थे
मेरे दायरों में तुम ,
और शायद बोल भी गए होगे
ख़याल रखने को

दिन भर ओढ़ कर रखती हूँ इसे
शाम को आधा बिछा लेती हूँ
और जो बचती है
इसे आँखों से गिरा
चादरों और तकियों
पे सजा लेती हूँ

ये सितारों जो सजे होते हैं तकियों पे मेरे
रात भर जुगनू सा टिमटिमाते हैं

डरती हूँ कहीं लौट करआ जाओ न तुम
मेरी शामों मेरे तकियों
पे सजे तारे समेट लेने को
लगा के मुझे फिर से
गुलाबी रौशनी का नशा
चुपचाप बिन कहे
फिर से चले जाने को
                                                               -मृदुला शुक्ला

उदासी..

बहुत ख़याल रखती है ये उदासी मेरा
दिन भर आस पास रहती है
जिसे छोड़ गए थे
मेरे दायरों में तुम ,
और शायद बोल भी गए होगे
ख़याल रखने को

दिन भर ओढ़ कर रखती हूँ इसे
शाम को आधा बिछा लेती हूँ
और जो बचती है
इसे आँखों से गिरा
चादरों और तकियों
पे सजा लेती हूँ

ये सितारों जो सजे होते हैं तकियों पे मेरे
रात भर जुगनू सा टिमटिमाते हैं

डरती हूँ कहीं लौट करआ जाओ न तुम
मेरी शामों मेरे तकियों
पे सजे तारे समेट लेने को
लगा के मुझे फिर से
गुलाबी रौशनी का नशा
चुपचाप बिन कहे
फिर से चले जाने को
                                                           -मृदुला शुक्ला

Tuesday, 2 April 2013

छोटे शहर

बस और ट्रेन मैं बैठ कर अक्सर
मेरा उस शहर से गुजरना होता है
जिसे छोटा शहर कहा जाता है
हर बार हचह्चाती हुई बस गुजरती है
उन्ही खडंजे वाली सड़कों से
जहाँ मेरी उम्र के बराबर की गुमटियों तब से खड़ी हैं
वैसे ही चार बिस्कुट डाले मर्तबानो मैं

उनकी केतलियाँ भी पुरानी नहीं होती
वैसे वो नयी भी नहीं थी कभी

बाहर बैठा मिल ही जाएगा वो योगी सा तटस्थ भाव लिए
जो बचपन में भी बूढा ही दिखता था
जिसका नाम वार महिना तिथि
या फिर अमावस पुन्वासी सा होगा

जाने क्यूँ मन की ज़मीन से होते हैं ये छोटे शहर
इनके भीतर कुछ बदलता ही नहीं
बाहर लाख बहती रहे बदलाव की बयार

प्रेम

मैं अक्सर
किसी न किसी के
प्रेम में
पड़ जाती हूँ
और फिर
काफी दिनों तक
रहती भी हूँ प्रेम में

मुझे याद है
मेरा पहला प्रेम
मैंने उसे
गली के मुहाने पर
पहली बार देखा था
कुछ सात एक साल की थी
उसके पंजो से खून रिस रहा था
वह ठंड से कांप रहा था
मैंने उसे गोद में उठाया
और घर ले आई

कोहराम सा
मच गया घर में
सबने यूँ हिकारत से
देखा मझे
जैसे कोई
घर से
भागी हुई लड़की
अपने प्रेमी के साथ
घर लौट आई हो
फिर सब कुछ वैसा ही हुआ था
जैसा प्रेम में होता है
दिन भर सोचते रहना
उसी के बारे में
अकेले में सोच कर
मुस्कुरा देना
उसके लिए सबसे लड़ना
और फिर  झूठ बोलना
(तब मैंने झूठ बोलना सीखना शुरू ही किया था)
एक नाम भी रखा था उसका मैंने
हिंदी में ही था
तब कुत्तो के अंग्रेजी नाम
कम हुआ करते थे
टी बी वाली बुआ के
अलग किये गए बिस्तरों
में से चुराकर
एक कम्बल
मैंने बना दिया था उसका एक बिस्तर
और फिर वो सोता रहता था
और मैं रात भर
उठ उठ कर उसे देखती रहती थी


दूसरा प्यार भी मुझे
उसी गली पर बैठे
एक अधनंगे पागल के साथ हुआ
जो हर पेपर को उठा कर
हर आने जाने वाले से
कहता था
'वकील साहब मिली ग हमरे रगिस्ट्री क पेपर'
तब तक मैंने पक्का वाला
जूठ बोलना सीख लिया था
माँ को कहती थी
की कितनी भूख लगती है मझे
सुर तुम टिफिन में देती हो
बस दो पराठे?
माँ को क्या पता था
की एक पराठा तो मैं
गली वाले पागल के लिए
बचा कर ले जाती थी
जिससे अभी अभी
मझे प्रेम हुआ था

फिर एक दिन खली था
गली का मुहाना
और कम्बल चुराकर
बनाया गया बिस्तर

देखो तब से आज तक
मैं बार बार पड़ जाती हूँ
प्रेम में ये जानते हुए
की होशो हवाश में रहने वाला आदमी
पागल और कुत्ते से तो कम ही वफादार होगा

शाकुंतलम

  1.  
    अभिज्ञान शाकुंतलम हर बार
    हर बार हर पात्र घटनाक्रम सही से लगते हैं

    सही लगता है
    एक महापराक्रमी राजा
    बन कुसुम सी मुकुलित शकुन्तला
    गंधर्व विवाह, एकांत रमण
    कितना सच्चा सा लगता है सब कुछ

    पर हर बार मन जाकर अटक जाता
    क्या सचमुच ऋषि शाप हुआ होगा
    शकुन्तला को,
    या वह अंश मात्र था
    चिर् शापित स्त्री जाति का

    अथवा
    शुकंतला ने खुद को ठगा हो
    अंगूठी और श्राप जैसी मनगढ़ंत
    कथाओं से
    जाने क्यों ये झूठ सा लगा मुझे

    फिर अचानक बदलता घटनाक्रम मछली मछुयारा
    सब कुछ याद आ जाना ,
    महापराक्रमी दुष्यंत का प्रेम प्रलाप
    झूठे अभिनय सा लगता है जाने क्यूँ ?

    और सबसे सच्चा लगता है
    सिंह शावक से क्रीडा करते
    भरत को देख दुष्यंत का मुग्ध होना !!
    क्या दुष्यंत तब भी मुग्ध होता ?
    यदि भरत खेल रहा होता मृग शावक से

    भावी सम्राट दिखा उसे
    याद आई शकुन्तला ,प्रेम ,भरत
    वात्सल्य पुनः अभिनय पुनः छल .

Wednesday, 27 March 2013

विस्फोट

धमाको से नहीं उड़ते
चीथड़े सिर्फ इंसानी जिस्मो के
बल्कि उड़ जाते हैं
परखच्चे
अमन और ईमान के

फिजा में रह जाती है बारूद की महक
बरसों बरस
इंसानी दिमाग मैं बैठे
नफरत के फितूर सी

अब फिर कुछ दिनों
तक इंसानियत
भीख मांगेगी
चौराहों पर
नुक्कड़ की पगली सी ......
(हम शर्मिंदा हैं )
                                                                             -

मृदुला शुक्ला

Tuesday, 26 March 2013

दूत

काली दास ने मेघो को चुना था
और मैंने तुम्हे
सन्देश देने के लिए ,

सुनो जब आज शुरू करोगे
तुम खुद से मुझ तक लौटने का सफ़र
तो रस्ते मैं आये सातों
समन्दरों से कहना !!!
इस प्रवास मैं कम हो गयी
तुम्हारी गहराई
उथले लगने लगे तुम
जब से नापी है
गहराई किसी परिपूर्ण
हृदय की !

और कहना
पहाड़ों से
तुम हरे से पीले हो जाते
बादलों के एक बरस के इंतज़ार मैं
और कोई  जन्म जन्मान्तर
तक तक प्रतीक्षा का
 विशवास लिए बैठा है

कहना नदियों से की
वो जारी रखें समुन्दर तक जाने का
सफ़र चिरकाल तक,
जब तक मीठा
न हो जाए समुंदर

आकाश यात्रा मैं जब
मिलेंगी व्योम बालाएं
तो बताना उन्हें
फीके से लगते हैं
तुम्हारे नकली चहरे
जब याद आता है किसी
प्रेममयी आँखों का माधुर्य
अब तक भी तो दूत ही थे न
आज मेरे बनोगे

                                                          -मृदुला शुक्ला

फागुन

सुना है इस शहर मैं हर साल
इसी मौसम में एक जोगी आता है
 इस शहर के लोग उसे फागुन सा कुछ कहते हैं

फागुन के आते ही इस शहर को कुछ हो जाता है
गाड़ियों से निकलते हैं गुलाबी धुवें
मोटरों की हॉर्न फाग गाती सी लगती है

वो धुप जो कुछ दिन पहले बालकनियों में
मरियल कुत्ते सी कूँ कूँ करती थी
आसमान की कनपटी पर गुलाबी होकर बिखर जाती है
आँखे तो देखो इसकी कैसी सुर्ख हो रक्खी है
अरे !
समझाओ इसे कोई फागुन को गुलाबी रंग ही फबता है
और देखो इन दरख्तों को अभी अभी तो उतारें हैं धूसर कपडे
और अब देखो हरे रंग मैं इतराते से हैं

मैं हर रोज ढूंढती हूँ फागुन को, मिल जाए कहीं
तो कस कर पकड़ लूं कलाई उसकी
वो दिखता नहीं गुम है इस शहर के हुजूम में कहीं

मैं चाहती  हूँ की वो ठहर जाए इस शहर में  कहीं
वर्ना जब वो जाता है  तो ले  जाता है
सारे रंग और कहकहे सब के होंठो से
और छोड़ जाता है सलेटी धुंवे मैं डूबा आसमान
सिले हुए होंठो के लोंगो से अटे रस्ते

और फिर शहर अकेला इंतज़ार करता है अगले  साल फागुन का
                                                                                                                -मृदुला शुक्ला

नैन

नैन कहते रहे, नैन सुनते रहे,
नैन ही नैन मे मुस्कुराते रहे|


वेदना की सभी मधुर अभिव्यक्तिया,
नैन ही नैन मे गुनगुनाते रहे|

गीत भी नैन हैं नैन ही साज हैं,
सात स्वर नैन है नैन झंकार हैं|

नैन श्रृंगार हैं नैन संहार हैं,
दंड भी नैन हैं नैन उपहार हैं |

नैन ही नैन मैं रूठ जाते हैं वो,
नैन ही नैन मे हम मनाते रहे|

नैन चटक लगे नैन सीपी लगे,
स्वाति की बूँद से इनमे मोती जगे|

नैन कान्हा लगे नैन राधा लगे,
नैन सम्पूर्णता नैन आधा लगे|

मन की अनुभूतियाँ धडकनों मे जगे,
नैन ही नैन विस्तार पाते रहे |

                                                                    -मृदुला शुक्ला

रतजगे

दिन के उजाले सोते
तू रतजगों में शामिल
महफ़िल रहे अकेली
वीरानियों में महफ़िल

तू साथ है
तो हर शय गाती और मुस्कुराती
जो तू नहीं
तो मुझको कुछ भी नहीं है हासिल

तुमसे भली तो मुझको
लगती तुम्हारी यादें
तू साथ दे या न दे
वो हो न मुझसे  गाफिल 

                                                       -मृदुला शुक्ला

बिछुए

दिन भर थकी आंते
बुझी आँखे
चमकाती रही मालिक
के किलो-किलो भर चांदी के बर्तन

और शाम
रुपहले रंग की सुनहली
चमक आँखों से निकल कानो तक फ़ैल गई
जब मेले मैं हरिया ने
दिलाये उसे चांदी से दिखने वाले बिछुए

दिन भर की थकान
हंस हंस कर बिखरती रही
मेले से घर लौटते
हरिया के काँधे पर
                                                           -मृदुला शुक्ला

रिश्ते

काश!!
रिश्ते सिले जाते
सुई धागे से

आखिरी छोर पर
एक मज़बूत गाँठ
लगा कर

काते जाते
चरखों पर

या फिर लपेट
कर रख लिए जाते
गर्म ऊन के गोलों की तरह
फंदा दर फंदा उतरते
सलाइओं पर

या कि फिर बनते
शहर के बाहर
कताई मिलों में
जिनकी चिमनिया
दूर से
क़ुतुब मीनार में
आग लगने का
भ्रम पैदा करती हैं

जिनके पिछ्वाड़ो
पर रहते रिश्ते बुनने वाले
दिहाड़ी मजदूर
आधे नंगे

तो क्या बदल जाता?
तब भी,
ठन्डे और गर्म
होते रिश्ते
बाजारों में बिकते रिश्ते
ऊँचे दामों पर
तो कभी ठेलों पर
नीलाम होते रिश्ते
कभी सस्ते
तो कभी महंगे होते,
ऊंची दुकानों में
फीके पकवानों से सजते रिश्ते

लेकिन..............
तब भी,
तुम जीते
रेशमी, गुलाबी
धागों से बुना
महकता खूबसूरत
महीन, जहीन मेरा रिश्ता

और मै............
बेतरतीब,अधउघडा
मोटे धागों से बुना,
जिसके पैबन्दो से
भी मै ढांप न पाती,
अपनी मोहब्बत
और तुम्हारी....................

मृदुला शुक्ला

मुखौटे

मुखौटे है हम
छुपा लेना काम है हमारा
ढांप लेना है हुनर

हम खाते हैं
गालियाँ
पीतें हैं आंसू
जीते है रुस्वाइयां
और मरते हैं बेनाम

हम कभी
किरदार में
नहीं उतरते
फिर भी
जीते हैं
हर किरदार
वो हमें
जिए न जिए

युगों से ढांपते रहे
बेचारगी
लाचारियाँ
मजबूरियां
मक्कारियां

तमाम मुल्कों की
सियासत
पलती है
चलती है
और फिर ढलती है
हमारे दम पर

हमने ही सभाला है
घर गृहस्थी
नैतिकता मर्यादा
सियासत मुल्क
और ये दुनिया

हमारे सपने
नहीं होते
हम मुखौटे भी
एक दुसरे के
अपने नहीं होते

फिर भी हमारा
न कोई इतिहास है
न भूगोल
और न अर्थशात्र
हमें दो सम्मान
हम पर महाकाव्य
करो हमारा गुण गन

वरना !!!

हम एक दिन
सामूहिक रूप से
उतर जायेंगे
तुम सब के चेहरों से

फिर देखते हैं
क्या क्या बचा
पाते हो तुम ?
                                      -मृदुला शुक्ला

त्रासद है गमलों मैं फूलों वालों पौधों होना
विस्तार नहीं पाती हमारी शिराएँ धरती से अमृत
सोखने तक

बौनी होती जाती है धमनियां
दिन ब दिन
बोनसाई बनने की
अनचाही यात्रा मैं

सुना है बागीचों मे फूलों पर चलती है
भौरों और तितलियाँ की प्रेम कहानियाँ
अमृत बटोरती मधुमखियाँ
मगन मन गुनगुनाती है उनके प्रणय गीत

हम उगते है घरो की बाल्कनियों
घरों का वो कोना जो जिन्दा रखता है
मरते हुए धरती आकाश ,चाँद तारों को

जहाँ मुह चिढाते हैं हमें रात भर काफी के
जूठे मग
तिर्यक मुख बियर की औंधी पड़ी बोतलें

पानी मिलता है तौल कर
(जिसे अक्सर भूल जाती है नामुराद कमला )
जो बूँद बूँद टपक जाता है हमारी
जिजीविषा रंध्रो से

चलो कोई नहीं
हमारा तो तब भी आधार है
हमारे कोमरेड
तो लटके होतें हैं खूंटियों पर
सलीब परजैसे ............
                                                                          -मृदुला शुक्ला
कतरा भर रौशनी ,
चुटकी भर उजास ,
होंठ भर हंसी ,
मुट्ठी भर ख़ुशी ,
आँचल भर प्यार ,
सिर्फ आँख भर विशवास
तितली के पंख भर रंग
ओस की बूँद भर आस
कभी रो कर
तो कभी हंस कर
कभी रूठ कर
तो कभी टूट कर
कभी फिसल कर
तो कभी मचल कर
कभी मान से अभिमान से

वो सब सब मुफ्त था
तुम्हारे लिए और
मैंने जब चाहा
अपने लिए

और तुमने इसे तिरिया चरित्तर कह दिया!!

औरतों ,

माओं ,

बहनों ,

बेटियो

वेश्याओं ,

कुलटाओं ,
बाहर आओ घरों से
कोठों से
शाही महलों से
हरमों से
आओ हम
तिरियाचरित्र शब्द गढ़ने वालो के चरित्तर के लिए एक नया शब्द गढ़ें
                                                                                                          -मृदुला शुक्ला

सीमा प्रहरी


"पहाड़"

जब नहीं छिड़ी होती जंग सरहदों पर
तब भी तो जूझते रहते हो तुम
लड़ते रहते हो अनेको जंग भीतर और बाहर
जब पड़ रही होती है बाहर भयानक बर्फ
सीने में धधकता सा रहता है कुछ

और रेत के बवंडरों में मन में उमड़ घुमड़
बरसता सा रहता है कुछ
जाने कैसे निभाते हो कई- कई मौसम एक साथ........

विषम परिस्थतियों में सरहदों रह रहे रणबांकुरों को सादर समर्पित .........
पहाड़
तुम्हारे घर जैसे मकान के पीछे
दूर पहाड़ों के पीछे जो बर्फ गिरी है
वो अब तक ठंडी महकती खूबसूरती
का भ्रम थी मेरे लिए

उसे देख कविता के बीज पड़ते थे मेरे भीतर
उसके सन्नाटे मेरे भीतर बजते थे
अनहद नाद की तरह
तब बर्फ का मतलब मेरे लिए
शुचिता पवित्रता अनछुआ भोलापन था
ओह...............................
आज देखी मैंने उसके भीतर धधकती
कुछ सीमा प्रहरियों के अकेलेपन की आग
अचानक देखा दूर पहाड़ों पर उठता धुंआ
और उसमे डूबती तुम्हारी
बोझिल शाम और अकेली उदास रात
उस आग मैं झुलसते देखी
तमाम छोटी बड़ी ख्वाहिशें
तुम्हारी खुद की
और तुम्हारे अपनों
लेकिन तुम्हे जलाए रखनी होगी ये आग ......
क्यूंकि इस आग मैं पकते है
एक मुल्क की मीठी नींद के सपने ........


"रेगिस्तान"

मन तो भागता होगा तुम्हारा
रेतके बवंडरों के पीछे                                                          


थाम लेने को महबूब का दामन समझ
दूर बहुत दूर जब दिखता होगा कोई नखलिस्तान
तो तुम तब्दील हो जाते होगे
रेगिस्तान के जहाज में
तुम भर लेते होगे ठंडक अपनी आँखों में ,महीनो के लिए
और ओढ़ लेते होगे हरियाली को माँ का आँचल समझ

जब नहीं आती चिट्ठियां तार संदेशे
तो फिर बनाते हो कालिदास के मेघों को दूत
मगर सुना है की रेगिस्तानो मैं बादल भी कभी
भूल कर ही जाते हैं

दग्ध रेत के जंगलों मैं जब उदास होते हो
तो रेत ने कहा तो जरुर होगा तुमसे ?
रेगिस्तान मैं रहना है तो जियो रेत बनकर

दिन भर तप कर भी वो कहाँ रखती है मन में ताप
शाम के धुंधलके से ही बादलों को लौटा सारी गर्मी
खिल जाती है रेत चांदनी रातों की शीतलता सी

जानती हूँ !
तृप्ति की तलाश में दग्ध हो तुम
मगर जलना होगा तुम्हे .............
क्यूंकि इसी आग मैं पकते हैं एक मुल्क
की मीठी नींद के सपने



"सागर "

थाह लेते हो अथाह समुंदर की
बस नहीं ले पाते खुद के मन की
बाहर जीत जाते हो जल दस्सुयों से
लेकिन अकसर हार जाते हो
भीतर की लड़ाई
बस दिखती नहीं वो हार                                                   


सपने कतरा कतरा बहते हैं समुंदर में
आँखों और समुंदर का पानी एक सा ही खारा होता हैं

जब नहीं शामिल हो पाते अपनी खुद की खुशियों में
तो समुंदर की लहरों के संगीत में ही सुन लेते हो
जचकी के ढोलकों की थाप बहन की विदाई की शहनाई

बाडवानल सुना है पढ़ा भी है
मगर भला पानी में भी कभी आग लगती है?
मगर ................
अक्सर तुम्हे देखा है बीच समुंदर में
झुलसते भावनाओं के बाडवानल में

लेकिन हे वीर !
झुलसना ही होगा तुम्हे इस आग में

 क्यूंकि इसी आग में पकते हैं एक मुल्क
की मीठी नींद के सपने




" जंगल "

भीतर उमड़ घुमड़ बरसता है मन
और बाहर बढ़ जाती है उमस
बचपन मैं भागते वक्त तितलियों के पीछे
पकड लेते थे तुम कई कीट पतंगे
और हथेलियों पर लेकर कर घूमते थे मकड़ियां
दादी के कहे के यकीन पर
की अब मुझे मिलेंगे नए कपडे
मगर सुनो है की इन जंगलों मैं जहरीले होते हैं कीट पतंगे
और वो बचपन की नए कपडे वाली मकड़ियां

तुम घिर जाते हो अचानक
एक अनजानी हरियाली से
हर पत्ता तो अनचीन्हा सा लगता है                    



अकेले मैं जिन्दगी तपती है
जेठ की दुपहरी सी
बियाबान में साफ़ दिखती हैं पगडंडिया
मगर बरसते ही बादलों के
खो जाते हैं तमाम रस्ते और
उनमे बढ़ जाते हैं सांप और बिच्छू

तुम कहाँ समझ पाते हो
की ताप भीतर ज्यादा है या बाहर
नमी मौसम मैं ज्यादा है या आँखों में
मत समझो इसे ,बस तपते रहो
क्यूंकि तुम्हारे ताप की
आग में पकते हैं एक मुल्क की मीठी नींद के सपने 



                                                                                       -मृदुला शुक्ला

Monday, 21 January 2013

तस्वीर का रुख बदल जाएगा

तीज पूजी
अहोई आठे
चौथ पूजी
छठ पूजी
मजबूत कलाईओं  को पकड़
रक्षा का सूत्र बाँधा
तिलक किया
लम्बी उम्र की कामना में
कभी बरगद
तो कभी पीपल
के फेरे लिए
मांग मांगी
कोख मांगी
पुत्र और भरतार माँगा
ताप माँगा
ओज माँगा
युद्ध में
रण में
विजय में
तेज माँगा
खुद जली
ब्रह्माण्ड सारा
रख कर डाला
सोचते हैं
हम कहा पर थे सही
और हमारी
कहाँ पर हैं
गलतियां
अब हमें ये
जीर्ण शीर्ण
विदीर्ण
तस्वीर बदलनी होगी
थाम कर
नाज़ुक कलाई को
बाँध दो अब
सूत्र रक्षा के नए
गढ़ेंगे हम
व्रत नए
अनुष्ठान नए
हंसी माँगे
ख़ुशी माँगे
भाव माँगें
दया माँगें
प्रेम माँगें
सरलता की
तरलता की
धैर्य की प्रतिमूर्ति-
बेटियां माँगें दुआ में
देखना फिर एक दिन
तस्वीर का रुख बदल जाएगा

Sunday, 6 January 2013

बस तुम हमारा साथ दो

मैं तुम्हारी ज़िन्दगी से आंसुओं के पल चुराकर,
मुस्कुराते हास के कुछ फूल भर दूंगी,
बस तुम हमारे साथ दो...........

मायूसी के, दुखों के, अवसाद के
लाख छाये मेघ/
खाद पानी भले ही मिलता रहे
विषमताओं का/
निराशाओं के चले हल/
पड़ चुके हो बीज चाहे हार के/
देखना तुम मैं उसी में
सहज ही,
मुस्कान बो दूंगी
बस तुम हमारा साथ दो.....

साथ में चाहे ज़माना हो न हो,
हौसलों से बढ़ा करते काफिले
होठ पर मुस्कान चाहे हो न हो,
आंसुओं से बढ़ा करते हौसले
राह मैं कांटे बिछे या फूल हों,
दृष्टि मे रहती सदा ही मंजिलें,
बन्धनों को /
रूढ़ियों को/
जीर्ण शीर्ण परम्परों को/
दिखा कर ठेंगा
देखना तुम,
एक दिन
मैं ख़ुशी के साथ हो लूँगी,
बस तुम हमारा साथ दो

-मृदुला शुक्ला

मुझे लिखना है............


सुनो,
कोई मुझे लिखना सिखा दो,
मैं लिखना चाहती हूँ ,
मुझे लिखना है--

उस रात के बारे में,
कितना अँधेरा था,
जब सधः प्रसव पीड़ा मुक्त,
मेरी माँ को,
दाई ने कहा होगा,
"एक और प्रसव पीड़ा बाकी है अभी तुम्हारे हिस्से मे"

मैं लिखना चाहती हूँ,
अपना बचपन,
गुड्डे गुड़ियों/ अभावों में शहंशाही

अपनी अनपढ़ माँ और उसके सपनो की मोटी किताबों के बारे में,
अपने पिता और हर रिश्ते पर भारी पड़ती उनकी महत्वाकांक्षा के बारे में,

मुझ धर्म पर नहीं लिखना|
अध्यात्म पर भी नहीं|
भूख और गरीबी पर तो बिलकुल नहीं|
राजनीती/ कूटनीति समझ ही नहीं आती मुझे|

मुझे तो बस लिखना है खुद के बारे में,
श्वेत अश्व/ राजकुमार ,
कसौटियों/ टूटते विश्वास,
के साथ परिपक्व होते छल के बारे में,
कोई मुझे लिखना सिखा दो|
मुझे लिखना है............

-मृदुला शुक्ला

पत्थर

"तुम"
और
तुम्हारे पीछे
चुप चाप चलती
"भीड़"
पास ही कहीं ?
नेपथ्य/श्मशान/सन्नाटा

अचानक
भीड़ के हाथों में
"पत्थर"
पास ही कहीं ?
मसीह/गैलीलियो/सुकरात

पत्थरों की कारस्तानी
आज जाना !!
समझ आया !!
तुम्हारा पूजा जाना
तुम जड़ होकर
"चेतना"
को विस्तार देते हो
मंदिरों में पथराये
से बैठे रहते हो
और भीड़ के
हाथ में आकर
आदमी को तार देते हो

आग

ज्वाला मुखी की
'आग'
कब बनना चाहा मैंने?
विध्वंस ही तो प्रतिबिंबित होता है|

यज्ञ की लपटे,
गिरती हुई समिधा के साथ ही,
तो ऊपर उठती हैं |
कभी पवित्र क्यों नहीं लगती मुझे ?
आसपास बैठे यज्ञोपवीतधारी पुरोहित,
अपनी आवाज़ ऊंची कर ,
एक दुसरे की आवाज़े दबाते हुए से लगते हैं मुझे|

और सूरज क्या बनना?
जिसे उगते समय ही तो अर्घ मिलता है,
वो भी भयवश|

और सप्तपदी की आग
वो भी कब बनना चाहती हूँ मैं?
किसने निभाई?
आजतक,
इसके इर्द गिर्द ली गयी कसमे|

मैं तो बनना चाहती हूँ-
राख के नीचे दहकता हुआ गोबर का उपला,
जिसे शाम के धुंधलके में,
कलछुल में माँगा जाता रहा है
हज़ारों हज़ार बरस,
जिसने भूख मिटाई है
सदियों तक
सभ्यता की|
चुप चाप !!!

-मृदुला शुक्ला

खाप

 


एक थी खाप
एक दिन

हुकुम हुआ
बेटियां ब्याह दी जाएँ
सोलह वर्ष से पूर्व

जनक ने सुना
स्वयंवर रचा
हजारों में
महापराक्रमी राम को चुना
और सोलह वर्ष से पूर्व
ब्याह दी गयी सीता
"फिर भी"
हरण/अग्निपरीक्षा/वन गमन
(अंत में भूमिगत ही होना पड़ा)

एक थे द्रुपद
उन्होंने ने सुना
स्वयंवर रचा
और सौंपी अपनी पुत्री
पांच महापराक्रमी पुरुषों की सुरक्षा में
फिर भी
चीरहरण?..............(क्या पहना था द्रौपदी ने उस समय कहीं मिनी स्कर्ट तो नहीं?)

एक थी अहिल्या............
..................................
..................................

अरे त्रेता के धोबियों
कलयुग में फिर से आ गए
नेता बनकर??
-मृदुला शुक्ला

Thursday, 3 January 2013

तुम भला क्या जान पाओगे ?


तवे पे सिकती हुई रोटियों की महक
भूख को कैसे बढाते हैं ?
कर्कटों में घुमते पीठ पर थैला लिए,
एक टुकड़ा प्लास्टिक का
बेकलों की आँख में,
उम्मीद के, कौन से सपने जागते हैं

तुम भला क्या जान पाओगे?

बादलों को देखकर झूमते हैं मोर
और गीत गाते हैं पपीहे,
और तुम भी तो,
मेघ और मल्हार के उत्सव मनाते हो !
चरमराती झुग्गियों
और फरफराती पन्नियों को देखकर
वे बेचारे रात भर,
किस तरह से सिहर जाते हैं ?

तुम भला क्या जान पाओगे ?!

करो तुम बाते बड़ी
अहले वतन की,
मान की
अभिमान की
अगरु चन्दन मान लो
धूल तुम अपने धरा की
बिन दवा बिन दूध के,
गोद में मरते हुए,
मौत से लड़ते हुए,
आंसुओं को रोकते,
पुतलियों का पत्थरों में बदल जाना

तुम भला क्या जान पाओगे?
-मृदुला शुक्ला

Wednesday, 2 January 2013

 सन्नाटे  बोकर  गीत  उगाती  हूँ!!

 सन्नाटे बोकर गीत उगाती हूँ
देखो मै तूफानों में भी दीप जलाती हूँ ,

बिजुरी को बाँधा है मैंने आँचल से
मैं मेह खींच कर लाती हूँ काले जिद्दी बादल से,

सूरज भी मेरी खातिर छुप छुप कर छांह करे है
अग्निमुखी गीतों से मै अलख जगाती हूँ,

सन्नाटे बोकर गीत उगाती हूँ!

बंजर मे भी बीजों के बिन आशा के पौध लगाती हूँ
शमशानों मे भी जाकर जीवन ही दोहराती हूँ,

घिर कर के घोर विप्पति मे भी अपना धर्म निभाती हूँ
मैं नीलकंठ विषपायी बनकर जहर पचाती हूँ,

सन्नाटे बोकर गीत उगाती हूँ !

-मृदुला शुक्ला